आधे-अधूरे मज़हबी इंसान! आखिर क्यों रह जाते हैं अमल के मैदान में पीछे?

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आधे-अधूरे मज़हबी इंसान बहुत खतरनाक होते हैं क्यूँकि ये अपनी कम इल्मी की वजह से अपने लिए सब कुछ जायज़ कर लेते हैं और दूसरों को हराम और हलाल का इल्म देते फिरते हैं!

ऐसे लोग तमाम उम्र दूसरों की बुराईयाँ तलाशने में लगे रहते हैं चाहे खुद के दामन में कितने ही गुनाहों का बोझ हो। मौला ए काएनात हज़रत अली (अ.स.) का इरशाद है के दूसरों को तालीम (हिदायत या दर्स) देने से पहले इंसान को खुद अपने आप को तालीम देनी चाहिए, दूसरों को हिदायत देने से पहले खुद उसे अपने तर्ज़े अमल से एक मिसाल पेश करनी चाहिए! वो इंसान जो पहले अपने आप को तालीम और हिदायत देता है उनसे से कहीं ज़्यादा बेहतर है जो दूसरों को तालीम और हिदायत देते हैं!

ज़्यादातर देखा गया है के जितना ज़्यादा दिखावटी, ज़ाहिरी तौर पर मज़हबी और उलटी सीधी रस्मों रिवाज का पाबंद इंसान होगा वो उतना ही ज़्यादा ख़तरनाक व बुरा इन्सान होगा। ऐसे इन्सान मज़हब के ऊसूलों को बस रस्मन निभाते हैं लेकिन इसकी असल रूह को पामाल कर देते हैं।

मज़हब को सबसे ज़्यादा नुकसान इसी तरह के इंसानो से पहुँचता है जो मज़हब को ढाल बनाकर समाज में अपने आप को इस तरह से पेश करते हैं के जैसे इनसे ज़्यादा कोई नेक और परहेज़गार व सच्चा इंसान कोई नहीं हैं लेकिन जब अमल की बात आती है तो ये लोग सबसे आख़िरी सफ़ में नज़र आते हैं।

दीन का मतलब सिर्फ़ कलमा पढ़ने से नहीं है बल्कि अमल से है जिसके पास अमल-ए-सालेह है वही सच्चा मज़हबी इंसान है और अमल वही करता है जिसके पास इल्म हो और जो सब कुछ जानकार भी अमल नहीं करता वो मुनाफ़िक़ कहलाता है।

मौलाए काएनात हज़रत अली (अ.स.) का इरशाद है के “इल्म अमल से वाबस्ता है लिहाज़ा जो जनता है वो अमल भी करता है क्यूँकि इल्म अमल को पुकारता है!”

यह लेख जनाब अली अख़्तर साहब ने लिखा है। यह उनकी फेसबुक वाल से लिया गया है।

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