बहरैन के शांतिप्रिय धर्मगुरू शैख़ ईसा क़ासिम के नज़रबंदी को 300 दिन पुरे

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बहरैन के वरिष्ठ धर्मगुरू शैख़ ईसा क़ासिम ने एेसी स्थिति में अपनी नज़रबंदी का 300वां दिन गुज़ारा कि वे हमेशा की जनता की ओर से सरकार के विरोध के शांतिपूर्ण रहने पर बल देते हैं।

बहरैन की जनता ने 14 फ़रवरी वर्ष 2011 से आले ख़लीफ़ा सरकार के ख़िलाफ़ अपना आंदोलन आरंभ किया था। सरकार ने न केवल यह कि आंदोलन को कुचनल का रास्ता चुना बल्कि उसने देश के राजनैतिक और धार्मिक नेताओं को बंदी बनाना भी शुरू किया ताकि अपने विचार में जनता को विरोध के दिशा निर्देशन को रोक दे।

इसी परिप्रेक्ष्य में उसने पहले तो जून 2016 में बहरैन के सबसे बड़े धर्मगुरू शैख़ ईसा क़ासिम की नागरिकता रद्द कर दी और फिर 23 मई 2017 से उन्हें उनके घर में नज़रबंद कर दिया। इसके लिए बहरैन की तानाशाही सरकार ने उन पर नागरिक दायित्वों का पालन न करने, लोगों को उकसाने, मनी लाॅंडरिंग और संविधान के उल्लंघन जैसे आरोप लगाए। इसी के साथ उसने शैख़ ईसा क़ासिम पर जुर्माना भी लगाया और उनकी संपत्ति भी ज़ब्त कर ली।

बहरैन की आले ख़लीफ़ा सरकार शैख़ ईसा क़ासिम को नज़रबंद करके एक ओर तो यह चाहती है कि देश की जनता से उनका संपर्क काट दे और दूसरी ओर उनके लिए सीमितताएं खड़ी करके उन्हें बहरैन के जनांदोलन में प्रभावी भूमिका अदा करने से रोक दे।

अलबत्ता वास्तविकता यह है कि आले ख़लीफ़ा सरकार अपने इन लक्ष्यों में विफल रही है क्योंकि बहरैन की जनता ने मई 2016 से ही, जबसे शैख़ ईसा क़ासिम को उनके घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है, उनके घर के निकट हर दिन और हर हफ़्ते प्रदर्शन करके उनसे अपने अटूट रिश्ते और एकजुटता को दर्शाया है।

निश्चित रूप से शैख़ ईसा क़ासिम के संबंध में अगर हिंसक और असम्मानीय रवैया जारी रखा गया तो इससे बहरैन के हालात अधिक जटिल ही होंगे जैसा कि अरब मामलों में ईरान के स्पीकर के प्रतिनिधि हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान का कहना है कि शैख़ ईसा क़ासिम के ख़िलाफ़ अन्यायपूर्ण अदालती आदेश जारी करने से न केवल यह कि बहरैन संकट के समाधान में कोई मदद नहीं मिलेगी बल्कि हालात अधिक पेचीदा हो जाएंगे।

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