हुसैन हैं ऐतबारे मुरसल, हुसैन का ऐतबार तुम हो, दरगाह हजरत अब्बास में हुआ जश्ने अबुल फजलिल अब्बास

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‘शुजाअतों के रसूल तुम हो, वफा के परवरदिगार तुम हो, हुसैन हैं ऐतबारे मुरसल, हुसैन का ऐतबार तुम हो’ फैय्याज बरेलवी के इस शेर पर रुस्तम नगर स्थित दरगाह हजरत अब्बास परिसर वाह-वाह, सुब्हानअल्लाह, बहुत खूब की दाद से गूंज गया।

मौका था लश्करे हुसैनी के अलमदार और इमाम हुसैन के भाई हजरत अबुल फजलिल अब्बास के जन्मदिन की खुशी में सजी महफिल जश्ने अबुल फजलिल अब्बास का। इस मौके पर देश-प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए शायरों ने अपने कलामों का नजराना बाबुल हवाएज की बारगाह में पेश किया। इससे पहले दरगाह हजरत अब्बास परिसर में नज्र और अलम की परचमकुशाई हुई, जिसके बाद 72 बच्चों ने अलमदारे फौजे हुसैनी की शान में तराना पेश किया।

उलमा व जाकिरों ने महफिल को खिताब करते हुए हजरत अब्बास की इमाम हुसैन से वफा और मोहब्बत पर रोशनी डालते हुए उनकी सीरत पर चलने का आह्वान किया।

लश्करे हुसैनी के अलमदार हजरत अब्बास के जन्मदिन की खुशी में शनिवार को दरगाह हजरत अब्बास परिसर में मगरिब की नमाज के बाद अलम की परचमकुशाई हुई।

मजलिस उलमा-ए-हिंद के महासचिव व इमामे जुमा मौलाना कल्बे जव्वाद नकवी ने या अब्बास-या अब्बास के नारों के बीच परचमकुशाई की, जिसके बाद अकीदतमंदों ने अलम की जियारत कर दुआएं मांगी। परचमकुशाई के बाद 72 बच्चों ने हजरत अब्बास की शान में सामूहिक तराना पेश किया, जिसके बाद कारी हुसैन ने तिलावते कलामे पाक से महफिल का आगाज किया।

महफिल की अध्यक्षता करते हुए मौलाना कल्बे जव्वाद ने कहा कि इमाम हुसैन और हजरत अब्बास का रिश्ता दुनिया की आमद के साथ ही शुरू हो जाता है।
कल हमने इमाम हुसैन के जन्मदिन की खुशियां मनायीं और आज हजरत अब्बास का यौमे पैदाइश मना रहे हैं।

मौलाना ने कहा कि कर्बला से पहले जो रिश्ता नबी और अली के बीच मिलता है उसकी तस्वीर इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की शक्ल में नजर आती है। हजरत अब्बास ने वफा की जो मिसाल पेश की, उसकी नजीर नहीं मिलती।

महफिल को खिताब करते हुए प्रो. अली खान ऑफ महमूदाबाद ने कहा कि अजीम हस्तियों की याद मनाना जरूरी है और उनकी सीरत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि जुल्म को जुल्म और जालिम को जालिम बताना इस बात की दलील है कि इस्लाम में उसूलों के साथ समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है।

उलमा की तकरीरों के बाद शायरों ने बारगाहे वफा में अपना नजराना पेश किया। फरहान बनारसी ने यजीदी फौज पर हजरत अब्बास के खौफ की तस्वीर खींचते हुए पढ़ा, ‘छीनने वालों अगर दम है तो छीनो दरिया, अब तो अब्बास ने बाजू भी कटा रखा हैÓ वहीं शबरोज कानपुरी ने हजरत अब्बास की बहादुरी का रिश्ता उनके नन्हें भतीजे जनाबे अली असगर से जोड़ते हुए पढ़ा, ‘कहा असगर ने हंस कर हुरमुला से, मेरे सीने में है अब्बास का दिलÓ।

अजहर मोहानी ने पढ़ा, ‘यह शहर नैजए अब्बास है सलाम करो, यहां पे तेगों को चलना सिखाया जाता हैÓ। देर रात तक चली महफिल में फख्री मेरठी, जफर नजफी, शबाब जलालपुरी, आमिर फैजाबादी, गौहर सुल्तानपुरी, रजी बिस्वानी, नजफ मुर्शिदाबादी, अस्करी गदीरी सहित अन्य शायरों ने अपने कलाम बारगाहे अबुल फजलिल अब्बास में पेश किये। इसके अलावा शहर के अन्य स्थानों पर भी महफिल-मीलाद और नज्र-नियाज का आयोजन कर अकीदतमंदों ने एक-दूसरे को हजरत अब्बास के जन्मदिन की मुबारकबाद पेश की।

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