दौलत, शोहरात और तमाम दुनियावी लज्जतों से खुद को दूर करके अपने रब से लौ लगाना सूफीवाद है

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सूफी शब्द की व्याख्या मुश्किल है, कोई कहता है यह शब्द यूनानी सोफिस्ट से आया है तो कोई मानता है कि यह शब्द अरबी भाषा के सफा शब्द से आया है। सफा शब्द का अर्थ पवित्रता से है। कुछ इसे सूफ यानि ऊन शब्द से भी जोड़कर देखते हैं। क्योंकि, सूफी संत ऊनी चोगा ज्यादा पहनते थे। इतना ही नहीं कुछ लोगों को यहां तक कहना है कि सूफी शब्द तस्सवुफ से आया है। लेकिन, हकीकत ये है कि सूफी शब्द इन तमाम व्याख्याओं का एक संगम है। इन खयालात का इज़हार प्रोफेसर शम्सी तहरानी ने अमरोहा में आयोजित सूफी कांफ्रेस में किया।

प्रोफेसर तहरानी ने सूफीमत पर उक्त विचार मंगलवार को हाशमी गर्ल्स डिग्री कालेज में हजरत सैयद हुसैन शरफुद्दीन शाह विलायत रहमतुल्लाह अलैह के 656 वें उर्स के सिलसिले में आयोजित नेशनल सूफी कांफ्रेंस में व्यक्त किए। इस कांफ्रेंस की शुरूआत कारी यासिर फारूकी ने तिलावते कलामे पाक से की। जबकि, मिर्जा साजिद अमरोहवी, जुबैर इब्ने सैफी, पंडित भुवन अमरोहवी व डॉ.मुबारक अली ने नाते नबी का नजराना पेश किया।

कांफ्रेंस में प्रोफेसर तहरानी ने आगे कहा कि 14वीं शताब्दी में अरब इतिहासकार इब्न-ए-खुल्दन ने सूफीवाद को बेहतर तरीके से परिभाषित किया है। दौलत, शोहरात और तमाम दुनियावी लज्जतों से खुद को दूर करके अपने रब से लौ लगाना और हर लम्हा इबादत में मशगूल रहना ही सूफीवाद है।

प्रोफेसर अजीजुद्दीन ने सूफीवाद पर अपने विचारों में कहा कि सूफियों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि हर तालीम किताबों में नहीं मिलती, कुछ तालीम सोहबत से भी मिलती है। सूफी उस शख्स को कहा जाता है जो हसरतों और ख्वाहिशों से दूर होता है और उसका ताल्लकु सिर्फ अल्लाह से होता है। जो, अपनी जिंदगी को कुरानी तालीम पर गुजारते हैं और दूसरे लोगों को भी इसका दर्स देते हैं।

दरगाह हजरत बाबा फरीदी रहमतुल्लाह अलैह के सज्जादानशीन ख्वाजा राशिद फरीदी ने कहा कि सूफीवाद इस्लाम का एक अहम पहलू है। लेकिन, मौजूदा वक्त में सूफी शब्द का गलत इस्तेमाल हो रहा है। जो, चिंतनीय है। उन्होंने आगे कहा कि सूफीवाद का इस्लाम को अलग रूप देने के लिए बड़ा योगदान रहा है। कई बड़े शायरों ने अपने सूफियाना कलाम के जरिए इस्लामी विचारों को पश्चिमी देशों तक फैलाया है।

कांफ्रेंस में सेंसर बोर्ड की पूर्व सदस्य रेखा गुप्ता व भाजपा नेता अतुल कुमार जैन ने भी विचार रखे। कांफ्रेंस की अध्यक्षता इमाम जुमा वल जमात डॉ.सैयद मोहम्मद सियादत नकवी तथा संचालन रिटायर प्रोफेसर नाशिर नकवी व कैसर मुज्तबा ने किया।

सूफियाना कलाम पर झूमे लोग
नेशनल सूफी कांफ्रेंस में बरेली से आए कव्वाल जीशान-फैजान ने अपने हमनवां के साथ मिलकर समा बांध दिया।। एक के बाद एक फारसी के कई कलाम पेश करके उन्होंने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। महफिल में करीब एक घंटे तक रंग जमाए रखा तथा खूब दाद हासिल की।

कांफ्रेंस में इन लोगों ने की शिरकत
हाजी जमील अहमद, मास्टर असलम उस्मानी, हकीम सैयद हुसैन, इकबाल अहमद खां, कौसर अब्बासी, अख्तर अब्बास अप्पू, हुसैन हैदर, मरगूब सिदद्ीकी, कमर नकवी, आदिल जफर खां, हकीम सुहैल, डा.लाडले रहबर, इमाम मेहंदी, नईम रजा, फजल कुरैशी, लोकेश सैनी, शाकिर अमरोहवी, मोहसीन रजा, आले मुस्ताफैन, रजा कमाल, आदिल रशीद, जुबैर हबीब, नुसरत उल्लाह, पूर्व चेयरमैन अफसर परवेज, नईम रजा, मोनू यादव, इसरार अहमद, उवैस मुस्तफा रिजवी, फाजिल नकवी, अली आब्दी, मरगूब सिद्दीकी, अली जहीन, मिक्की नकवी, मास्टर नकी, मोहम्मद हसनैन, फैसल जफर, डॉ.मनसब, दिलनवाज नकवी, अहमद रजा, सूफी तस्ददुक, सूफी निशात सिद्दीकी, कुर्बान अली, नवैद अजमी, इकबाल खान, डॉ.जफर महमूद, आलेनबी, नूर मोहम्मद, जुबैर हबीब, डॉ.अताउल्लाह, कामिल सिद्दीकी, डॉ.तौसीफ, यासिर अंसारी, नदीम राईनी, अली इमाम रिजवी

सम्मानित हुई ये हस्तियां
कांफ्रेंस में इमाम जुमा वल जमात मौलाना डॉ.सैयद मोहम्मद सियादत नकवी, हाशमी एजुकेशनल ग्रुप के चेयरमैन डॉ.सिराजुददीन हाशमी, पूर्व चेयरमैन अतुल कुमार जैन, दरगाह बाबा फरीदी के सज्जादानशीन ख्वाजा राशिद फरीदी, सेंसर बोर्ड की पूर्व सदस्य रेखा गुप्ता, प्रोफेसर अजीजुद्दीन, प्रोफेसर शम्सी तहरानी, मिर्जा साजिद अमरोहवी, जुबैर इब्ने सैफी, मुबारक अमरोहवी, पुलिस क्षेत्राधिकारी जितेंद्र कुमार व कोतवाली प्रभारी राकेश कुमार को दरगाह के प्रशासक हसन शुजा द्वारा दरगाह शाह विलायत के स्मृति चिंह से सम्मानित किया गया।

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