दीन और हम में मनाया गया विलादते ए जश्न ए इमाम हसन (अस)

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इस साल भी “दीन और हम” क्लासेज़ में शबे विलादते इमामे हसन (अ०) की मुनासेबत से जश्न का एहतेमाम किया गया जिसमे शोअरा ने इमाम की शान में क़सीदा पढ़ा और टीचर्स ने इमाम (अ०) की ज़िन्दगी पर मुख़्तसर रोशनी डाली ताकि जवानों को रसूले ख़ुदा (स०) के बड़े नवासे की ज़िंदगी से आशना किया जा सके।

लेवल-3 क्लास को सम्बोधित करते हुए मौलना अली अब्बास खान ने बताया कि, दीन यानी अक़ाइद, अख़लाक़ और अहकाम का वह मजमूआ जो अल्लाह की तरफ से इंसान की हिदायत और उस की कामयाबी के लिए मुअय्यन किया जाता है।

उन्होंने कहा कि दीन की परिभाषा से यह समझ में आता है कि दीन अल्लाह का बनाया हुआ है। दीन अल्लाह की बनायी हुई एक हक़ीक़त है और जबकि दीनदारी एक इंसानी अमल है लेहाज़ा दीन में गलती मुमकिन नहीं है अगरचे दीनदार ग़लती कर सकता है।
दीन को सही जगह से हासिल करना चाहिए नकि हर किसी से।

उन्होंने बताया कि इल्म चार तरह का होता है, हिस्सी इल्म, ख़याली इल्म, वहमी इल्म और अक़्ली इल्म। दीन अल्लाह बनाता है फिर उसको वहय के ज़रिये हमारे लिए भेजता है जो नबी ए करीम (स०) के बाद क़ुरान और इतरत की सूरत में हमारे सामने मौजूद है। क़ुरान और इतरत को समझने के लिए दो ज़रिये मौजूद हैं, नक्ल और अक़्ल। लेहाज़ा अक़्ल दीन और वह्य के मुक़ाबिले में नहीं है बल्कि अक़्ल नक़ल के बराबर है और अक़्ल और नक़ल दोनों में ग़लती का इमकान भी है लेहाज़ा वही लोग अक़्ल और रेवायत के ज़रिये सही दीन को समझ सकते हैं जिन्होंने इस के तरीके से सीखा हो और इस को सही से अपनाया हो।

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