हज़रत अली की शहादत पर मनाए भारत सरकार आतंकवाद विरोधी दिवस: शौकत भारती

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आज से लगभग 1400 वर्ष पुर्व ईराक के शहर कुफा की एक मस्जिद मे जिस वक्त मुसलमानो के चौथे खलीफा और शियो के पहले इमाम हज़रत अली सुब्ह की नमाज़ पढ रहे थे उसी समय एक आतंकवादी इब्ने मुल्जिम ने उनके सर पर तलवार से हमला करके उन्हे बुरी तरह घायल कर दिया जिसके कारण 21 रमज़ान को उनकी शहादत हो गई।

अध्यक्ष असर फाऊंडेशन, शौकत भारती ने कहा कि हजरत अली जो मोहम्मद साहब के दामाद भी थे, जैसे ही उन्होने खिलाफत (सत्ता) की बागडोर सम्भाली तो सभी भ्रष्ट एवं अपराधी गवर्नर एवं अधिकारियों को उनके पद से हटा दिया एवं समाज के हर वर्ग के साथ न्याय करते हुए उनके अधिकारों को उन तक पहुँचा दिया।
उन्होने अपने राज्य में मात्र रोटी, कपडा और मकान देने का नारा ही नही दिया बल्की उसकी सम्पूर्ण व्यवस्था भी करके दिखा दिया।

उनके राज्य से भ्रष्टाचारी, अपराधी एवं धर्म की अाड में छूपे हुए सत्तालोभी अत्याधिक परेशान थे क्योंकि वो उनके राज्य में भ्रष्टाचार एवं अपराध नही कर पा रहे थे। धर्म की अाड और इस्लाम की भेस में छूपे सत्ता हथियाने की चाहत रखने वाले इस टोले को उस समय खार्जी एवं नासबी टोले के नाम से जाना जाता था जो रात दिन दिखावे के लिए नमाज़ रौज़ा करता था और इसलाम के भेस में छूपकर हजरत अली की इस्लामी खिलाफत को खत्म करने की योजना बनाया करता था।

इस टोले ने सर्वप्रथम हजरत अली के उपर तीसरे खलीफा के कत्ल का आरोप लगाकर जनता को उक्साना शुरू किया जिसके कारण हज़रत अली को सर्वप्रथम जंगे जमल करनी पडी और उसके पश्चात नासबी टोले के मुखिया माविया इबने अबूसूफियान से जंगे सिफ्फीन और खार्जी टोले से जंगे नहरवान करनी पडी। जंगे सिफ्फीन मे कुरान को सामने लाकर माविया ने जंग रूकवादी जिसके कारण नासबी टोला जंग मे मारे जाने से बच गया लेकिन जंगे नहरवान मे 99 प्रतिशत खार्जी टोले के लोग मारे गये जो बच गये वो हज़रत अली की दुश्मनी मे माविया के नासबी टोले के करीब हो गये यही कारण था कि माविया इब्ने अबुसूफियान ने हज़रत अली का कत्ल करवाने के लिए इब्ने मुल्जिम नाम के खार्जी को कुफे की उस मस्जिद मे जहा हज़रत अली नमाज़ पढाते थे वहां भेजने की योजना बनाई और इस कार्य के लिए अश असे किन्दी को तैयार किया गया जो माविया का बहुत ही विश्वासपात्र था जिसने मस्जिदे कुफा के समीप रहने वाली उस खूबसुरत सुन्दरी के घर मे इब्ने मुल्जिम को पहुचा दिया।

जो हज़रत अली की बहुत बड़ी दुश्मन थी जिसका नाम खुत्तमा था। खार्जी इब्ने मुल्जिम ने खुत्तमा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा , ये सुनकर कुत्तामा ने शर्त रखी कि जब वो उसे हज़रत अली का सर लाकर देगा तभी वो उससे शादी करेगी। शर्त के तय होने के बाद इब्ने मुल्जिम खार्जी खुत्तमा के घर रूक गया और वही से रात के अंधेरे मे 19 रमजान को मस्जिदे कुफा मे ज़हर मे बुझी हुई तलवार लेकर प्रवेश कर गया। भोर में जब हज़रत अली नमाज पढने मस्जिद आए और वो जब सजदे की हालत मे थे तो मौका पाकर इबने मुल्जिम ने उनके सर पर तलवार का भरपुर हमला कर दिया और वो बुरी तरह ज़ख्मी हो गए जिसके कारण 21 रमजान को हज़रत अली की शहादत हो गई।

शौकत भारती ने कहा कि इतिहास मे मस्जिद के अंदर किसी नमाजी पर होने वाला ये पहला आतंकवादी हमला था जो खार्जी और नासबी टोले ने मिलकर मस्जिद के अंदर करवाया था। इसके बाद से ही सत्ता हासिल करने के लिए हजरत अली के दुश्मन नासबी और खार्जी टोले ने आतंकवादी हमलो की होड लगादी, किसी के हाथ पैर कटवाऐ किसी को ज़हर दिलवाया किसी को जिन्दा जानवर की खाल मे सिलवाकर जलवा दिया गया, किसी की जबान काटी गई तो किसी को सुली दी गई।

और इसी तरह के आतंकवाद को बढावा देकर माविया इबने अबू सूफियान ने सत्ता हथिया ली और सत्ता हतियाते ही मस्जिदों से हज़रत अली को बुरा भला कहना और गालियां देना आरम्भ करवा दिया।

उन्होंने मांग कि इस विचारधारा से लोगों को अवगत कराने के लिए 21 रमजान के दिन को आतंकवाद विरोध दिवस के रूप मे मनाया जाये ताकी धर्म की अाड में छूपे हुए आतंकवादीयों को बेनकाब किया जा सके। 21 रमजान को देश भर मे सरकारी अस्तर पर आतंकवाद विरोध दिवस मनाना विश्व शांति और मानवता रक्षा के लिए अति आवश्यक है।

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