इस्लाम में नए साल का अाग़ाज़ ग़म और अफ़सोस से किया जाता है

Share This News

इस दुनिया की ज़्यादातर तहज़ीबों में नए साल का आग़ाज़ ख़ुशियों से होता है, जिसका ख़ैर मक़्दम दावतों और जश्नों से किया जाता है, जो कई बार गुनाहों का सबब भी बनता है।

लेकिन इस्लाम में, और ख़ास तौर पर, अक़ायद-ए-अह्ल अल-बैत में, नए साल का अाग़ाज़ ग़म और अफ़सोस से किया जाता है। उस पुकार से किया जाता है, जो बद उनवानी, बुराईयों और गुनाहों को जड़ से मिटाने के लिए उठाई जाती है, ना कि उसमें मुब्तिला होने के लिए।

ये एक ऐसा मौक़ा होता है, जिसमें आवाज़ उठती है, न सिर्फ़ हर तरह के दुनियावी ज़ुल्म और ज़ालिम के ख़िलाफ़, न सिर्फ़ हर किसी मज़लूम के हक़ के लिए, बल्कि आवाज़ उठती है, हमारे अंदर के उस ज़ुल्म के ख़िलाफ़, जिसकी तरफ़ हमारे ओछे जज़्बे और हमारी नीच ख़्वाहिशें हमें खींचती हैं।

जिस तरीक़े से दुनिया की सियासी आब-ओ-हवा बदल रही है ऐसे में हमारे लिए ज़रूरी हो गया है की मुहर्रम की मजलिसों में हिस्सा लें और कर्बला के पैग़ाम को 61 हिजरी तक महदूद न होने दें। बेशक इमाम हुसैन(अस) कर्बला के मैदान में शहीद हो गए लेकिन इमाम ने अपने पैग़ाम को उस वक़्त के लिए महदूद नही किया। इमाम(अस) ने अपने सफर के दौरान यह वाज़ेह कर दिया के उनका मिशन वक़्त , सरहदों और कौमों में महदूद नही है।

इमाम(अस) ने यह सुनिश्चित कर दिया के हम भी अपने नज़रिए में हुसैनी रहेगें और हर तरह की यज़ीदी फिक्र को ठुकरा देंगे। इमाम हुसैन(अस) ने मोहम्मद हनाफ़िया को अपना मक़सद बताते हुए कहा “मेरा मक़सद न तो ख़ूनरेज़ी करना है और न ही तख़्त हासिल करना। मेरा मक़सद मेरे नाना की उम्मत की इस्लाह करना है। मेरा मक़सद समाज में नेकी की हिदायत , बुराई को रोकना और अपने नाना और बाप के तरीक़े पर अमल करना है”

इस मुहर्रम, चाहे कुछ भी हो, हमे इमाम हुसैन(अस) के मक़सद को अपने दिलो-दिमाग़ में रखना है और ख़ुदसे वादा करना है की अपनी ज़िंदगी और अक़ीदे की बेहतरी के लिए काम करेंगे।

कैथरीन शकदम लिखती हैं शफ़क़्ना न्यूज़ के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

loading...