इस रिपोर्ट में जाने अरफ़ा के दिन की खूबियां!

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अरफ़े का दिन दुआ और इबादत के लिए कुछ ख़ास दिनों में से एक है, विशेषकर जब उस दिन अरफ़ात के मैदान में हों। हज के अरकान में से एक अरफ़ात के मैदान में ठहर कर अल्लाह की इबादत करना भी है। ज़िलहिज्ज महीने की 9 तारीख़ को हाजियों को सुर्योदय से सूर्यास्त तक अरफ़ात के मैदान में ठहरना होता है।

अरफ़ात पवित्र मक्का से 21 किलोमीटर दूर जबलुर्रहमा नामक पहाड़ के आंचल में एक मरूस्थलीय क्षेत्र है। ऐसा विशाल मैदान जहां इन्सान दुनियावी चीज़ों को भूल जाता है। अरफ़ात शब्द का मतलब मारेफ़त शब्द से है जिसका अर्थ होता है अल्लाह की पहचान और अरफ़ा का दिन इंसान के लिए परिपूर्णतः के चरण तय करने की पृष्ठिभूमि तय्यार करने का सर्वश्रेष्ठ अवसर है।

इन्सान पापों से प्रायश्चित और प्रार्थना द्वारा पापों और बुरे विचारों से पाक हो जाता है और अल्लाह की ओर पलायन करता है। पूरे इतिहास में ऐसे महान लोग गुज़रे हैं जिन्होंने अरफ़ात के मैदान में अल्लाह की इबादत की। इतिहास में है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत हव्वा ने पृथ्वी पर उतरने के बाद अरफ़ात के मैदान में एक दूसरे को पहचाना और अपनी ग़लती को स्वीकार किया। जी हां अरफ़े का दिन पापों की स्वीकारोक्ति, उनसे प्रायश्चित और अल्लाह की कृपा की आशा करने का दिन है।

अरफ़ा वह दिन है कि जब अल्लाह अपने बंदों का इबादत और उपासना के लिए आहवान करता है, इस दिन अल्लाह की कृपा और दया धरती पर फैली हुई होती है और शैतान अपमानित हो जाता है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) फ़रमाते हैं: हे लोगो, क्या मैं तुम्हें कोई शुभ सूचना दूं? लोगो ने कहा हां, जी अल्लाह के नबी। आप ने फ़रमाया, जब इस दिन सूर्यास्त होता है, अल्लाह फ़रिश्तों के सामने अरफ़ात में ठहरने वालों पर गर्व करता है और कहता है, मेरे फ़रिश्तो मेरे बंदों को देखो कि जो धरती के कोने कोने से बिखरे हुए और धूल में अटे हुए बालों के साथ मेरी ओर आए हैं, क्या तुम जानते हो वे क्या चाहते हैं? फ़रिश्ते कहते हैं, या अल्लाह तुझ से अपने पापों के लिए क्षमा मांगते हैं। अल्लाह कहता है, मैं तुम्हें साक्षी बनाता हूं, मैंने इन्हें क्षमा कर दिया है। अतः (हे हाजियों) जिस स्थान पर तुम ठहरे हो वहां से क्षमा प्राप्त किए हुए एवं पवित्र होकर वापस लौट जाओ।

अरफ़े का दिन इबादत और प्रार्थना का दिन है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें हज करने और अरफ़ात के मरूस्थलीय मैदान में उपस्थित होने का अवसर मिला है। अरफ़ात की वादी में हाजी, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दिन की विशेष दुआ पढ़ते हैं। मानो किसी विशाल समारोह का आयोजन है, जिसमें अल्लाह के बंदे जीवन एवं ब्रह्मांड के रहस्यों को प्राप्त करना चाहते हैं और अल्लाह से निकट होने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

अरफ़ात की वादी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इस दिन की विशेष दुआ की याद अपने दामन में समेटे हुए है। अरफ़े के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने बेटों, परिजनों और साथियों के एक समूह के साथ ऐसी स्थिति में अपने ख़ेमे से बाहर आए कि उनके चेहरे से विनम्रता व शिष्टता का भाव प्रकट था।

उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जबलुर्रहमा नामक पहाड़ के बाएं छोर पर खड़े हो गए और काबे की ओर मुंह करके अपने हाथों को इस प्रकार चेहरे तक उठाया जैसे कोई निर्धन खाना मांगने के लिए हाथ उठाता है और फिर अरफ़े के दिन की विशेष दुआ पढ़ना शुरु की। यह दुआ शुद्ध एकेश्वरवाद और ईश्वर से क्षमा याचना जैसे विषयों से संपन्न है।

वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दुआए अरफ़ा द्वारा अनेक नैतिक एवं प्रशैक्षिक बिंदुओं का हमें पाठ दिया है। इस मूल्यवान दुआ में जगह जगह पर नैतिकता के उच्च अर्थ निहित हैं। कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ईश्वरीय अनुकंपाओं का उल्लेख करते हैं, कभी ईश्वर से आत्मसम्मान की दुआ मांगते हैं और कभी कर्म में निष्ठा की प्रार्थना करते हैं।

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