जानिए, इमाम हसन (अस) गरीबो की परेशानी को कैसे और क्यों दूर करते थे

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हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की विलादत माहे रमज़ान की पन्द्रहवी (15) तारीख को सन् तीन (3) हिजरी में मदीना में हुआ था। जलालुद्दीन नामक इतिहासकार अपनी किताब तारीख़ुल खुलफ़ा में लिखता है कि आपकी मुखाकृति हज़रत पैगम्बर से बहुत अधिक मिलती थी।

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के वालिद हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम तथा आपकी माँ हज़रत फ़ातिमा ज़हरा थीं। आप अपने माता पिता की पहली औलाद थे।

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम का पालन पोषन आपके माँ, बाप व आपके नाना हज़रत पैगम्बर (स0) की देख रेख में हुआ। तथा इन तीनो महान् शख्सियतों ने मिल कर हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम में मानवता के समस्त गुणों को विकसित किया।

हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की इमामत का समय
शिया सम्प्रदाय की विचारधारा के अनुसार इमाम जन्म से ही इमाम होता है। परन्तु वह अपने से पहले वाले इमाम के स्वर्गवास के बाद ही इमामत के पद को ग्रहन करता है। अतः हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने भी अपने पिता हज़रत इमाम अली की शहादत के बाद इमामत पद को सँभाला।

जब आपको इमामत मिली तब तो चारो तरफ अराजकता फैली हुई थी। इसकी वजह थी इमाम अली की शहादत। माविया ने इस मौके का फ़ायद उठाकर विद्रोह कर दिया।

इबादत

पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे और हज़रत अली के बेटे इमाम हसन भी अपने नाना और वालिद की तरह अल्लाह की इबादत के लिए बहुत ज़्यादा पाबंद एवं जगह थे। अल्लाह की महानता का इतना आभास करते थे कि नमाज़ के समय चेहरा पीला पड़ जाता और जिस्म कांपने लगता था, हर समय उनकी ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र ही रहता था।

इमाम हसन गरीबो के साथ

तारिख में आया है कि किसी भी ग़रीब व फ़क़ीर को उन्होने अपने पास से बिना उसकी समस्या का समाधान किये जाने नहीं दिया। किसी ने सवाल किया कि आप किसी मांगने वाले को कभी ख़ाली हाथ क्यों नहीं लौटाते। तो उन्होने जवाब दिया “ मैं ख़ुद अल्लाह के दरवाज़े का भिखारी हूं, और उससे आस लगाये रहता हूं, इसलिये मुझे शर्म आती है कि ख़ुद मांगने वाला होते हुये दूसरे मांगने वाले को ख़ाली हाथ भेज दूं। अल्लाह ने मेरी आदत डाली है कि लोगों पर ध्यान दूं और अल्लाह की नेमतें उन्हें प्रदान करूं।

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