झगड़ालू व्यवहार के कारण जीवन बर्बाद मत करो: इमाम जाफ़र अल सादिक़ (अस)

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25 शव्वाल 1437 हिजरी को पैग़म्बरे इस्लाम (स) के उत्तराधिकारी हज़रत अली (अ) के वशंज इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की शहादत की वर्षगांठ है। 28 वर्षों तक इमामत की ज़िम्मेदारी संभालने और मुसलमानों का मार्गदर्शन करने के बाद 765 ईसवी में 65 वर्ष की आयु में अब्बासी ख़लीफ़ा मंसूर ने ज़हर द्वारा इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को शहीद करा दिया।

मुसलमानों के बीच इमाम की लोकप्रियता और उनके हज़ारों शिष्यों के कारण अब्बासी ख़लीफ़ा मंसूर उन्हें अपने अवैध शासन के लिए एक चुनौती समझता था। शहादत के बाद इमाम सादिक़ (अ) को पवित्र मदीना शहर में स्थित जन्नतुल बक़ी क़ब्रिस्तान में दफ़्ना दिया गया।

सुन्नी मुसलमानों के चार बड़े इमामों में से तीन इमाम शाफ़ई, मालिक और अबू हनीफ़ा इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के शिष्य थे और उन्होंने हज़रत से इस्लामी विषयों की शिक्षा प्राप्त की थी।

इमाम जाफर सादिक़ अ.स. ने अपने शियों द्बारा अपने शियों को कुछ वसीयतें फरमाई थी। उनमें से एक हठधर्मी पर थी।

इमाम (अस) ने कहा ऐ नोमान के बेटे हठधर्मी से बचो, क्योंकि यह अमल को नष्ट कर देता है, और झगड़ालू व्यवहार के कारण जीवन बर्बाद मत करो क्योंकि अल्लाह से दूर कर देता है, पहले के लोगों के जीवन को देखो वह किस प्रकार चुपचाप जीवन बिताने का प्रयास करते थे और तुम लोग अधिक बोलने का प्रयास करते हो। पुराने ज़माने में लोग अल्लाह की अधिक इबादत के लिए दस साल तक चुप रहने का प्रयास करते थे, और अगर वह इस प्रयास में कामयाब हो गए तभी अपने आप को अल्लाह की इबादत करने वाला समझते थे वरना कहते थे कहाँ हम कहाँ अल्लाह की इबादत, वह कहा करते थे, जो भी गुनाह से बचेगा, और बुरी बातों से अपनी ज़ुबान को पाक रखेगा और मुसीबत के समय सहन करेगा वही कामयाब होगा।

यही लोग अल्लाह के चुने हुए उसके ख़ास बंदे और सच्चे मोमिन हैं, और ख़ुदा की क़सम अगर तुम में कोई सोने से भरी ज़मीन के बराबर नेकी करे लेकिन किसी मोमिन भाई से हसद और जलन करने लगे तो अल्लाह उसे उसी सोने से उसके बदन को पिघला कर उसकी सज़ा देगा। ऐ नोमान के बेटे, अगर किसी से किसी चीज़ के बारे सवाल किया जाए और वह थोड़ा जवाब भी जानते हुए यह कह दे कि वह इस बारे में कुछ नहीं जानता, तो उसने इल्म के साथ इंसाफ़ नहीं किया। (उसूले काफ़ी, जिल्द 8, पेज 288)

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