ख़ामोशी और मसलहत पसन्दी हर मौके पर मुनासिब नहीं, मुत्तहिद तौर पर सामने आएं उलेमा: डॉ कल्बे सिब्तैन

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सोशल मीडिया पर अक्सर शिया समुदाय के लोग शिया उलेमा से एकजुट होकर क़ौम के मसले उठाने को लेकर मांग करते रहे हैं और साथ ही किसी भी सियासी पार्टी की हिमायत से बचने की भी मांग करते रहे हैं।

ऐसे में एक डॉ कल्बे सादिक़ के बेटे और शिया स्कॉलर डॉ कल्बे सिब्तैन नूरी ने शिया उलमा से एक साथ आने की मांग की है और साथ थी सियासत के लिए हो रहे मज़हब के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का आवाहन किया है।

उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि आसिफी मस्जिद लखनऊ के इमामे जुमा बरादरम मौलाना कल्बे जवाद साहब ने आज के ख़ुतबे में जिस तरह उन कुछ सियासी लोगों की सख़्त मज़म्मत की है जो अपने सियासी फायदे के लिए शिया मसलक का मज़ाक़ उड़वा रहे हैं और बदनाम कर रहे हैं। इस बयान की मैं पुर ज़ोर हिमायत करता हूँ।

उलमा के मांग करते हुए उन्होंने लिखा कि सभी ओलमा व ज़ाकेरीन हज़रात से भी गुज़ारिश है कि खुल कर इन issues पर अपनी राय रखें। ख़ामोशी और मसलहत पसन्दी हर मौके पर मुनासिब नहीं है। अगर सभी ओलमा मुत्तहिद हो कर एक साथ सख़्त रुख़ अपना लें तो फिर किसी की हिम्मत न पड़ेगी कि गाय को राखी बंधवा कर, नाम निहाद मौलवियों को लिफाफा दे कर सियासी पार्टी का झंडा बुलंद करवा के या खुले आम मुशरिकाना हरकते करके शिया मसलक जो अस्ल मसलके तौहीद है को बदनाम कराने की सोचें।

उन्होंने आगे लिखा कि अभी इस लिए हिम्मत पड़ जाती है कि जानते हैं कोई बोलेगा नहीं सब खामोश रहेंगे। ओलमा को अपनी ताकत का एहसास होना चाहिए। सालों पहले जब शादियों में गाने और म्यूज़िक शुरू हुई थी और ओलमा ने तय कर लिया था कि उन शादियों में निकाह नहीं पढ़ाएंगे तो कुछ ही वक़्त में ये सिलसिला रुक गया था। इन मसायल पर तो आपसी इख़्तेलाफ़ात भुला कर एक राय होना चाहिए क्योंके ये मसलक की इज़्ज़त और वक़ार का मामला है।

बाबरी मस्जिद मामले पर उन्होंने लिखा कि बाबरी मस्जिद के सिलसिले में सबको सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एहतिराम करना चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही ये कह चुका है कि जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला होगा वो मुसलमानों को क़ुबूल होगा। इलेक्शन से पहले जान कर इस तरह के मामलात उठाये जाएंगे। हम सबको बहुत होशियारी और दूर अंदेशी का मुज़ाहिरा करना होगा।

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