हम अपने शहीद इमाम (अस) को लब्बैक कह भी सकेंगे या नहीं?

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मुहर्रम का महीना आ चुका है, मोमिनों की दिली चाहत फिर जोश मार रही है कि वह इस मौके को भुनाएं और ख़ुद में बेहतर बदलाव ला सकें, वह बन सके कि जिसकी तवक्को हमारे इमाम (as) को हमसे थी।

इन आने वाले दिनों में उन्ही रस्मों रिवाज में मुब्तेला हों की कि जिनसे ज़रूरी तब्दीलियां आ सकें, उन रिवाजों से बचना चाहिए कि जिनका नाता ख़ुदाई सुतून से परे है और हमारे ज़मीर पर कुछ ख़ास असर न रखते हों।

मौला हुसैन कर्बला के मैदान में यज़ीद के विरुद्ध इस लिए खड़े हुए थे ताकि उस वक़्त के बाशिंदों मे बेदारी ला सकें, उनकी रूहानियत को ज़िंदा ओ आबाद फरमा सकें, और यह दिखा सकें कि दीने इलाही से किस क़दर वह दूर हो चुके थे।

आज का मुसलमां किसी बेहतर दौर से नहीं ग़ुज़र रहा है, हमारे भी दिलों में खोखलापन हो चूका है, दुनियावी लगाव ख़ूब पनप रहा है। हमारा दिमाग फ़िज़ूल के हथकंडों से ख़ाली नहीं है।

आख़िर में सवाल फिर वही आता है कि क्या इस बार हम ख़ुद में वह बेहद ज़रूरी बदलाव लाने की गुंजाईश रखते हैं ? क्या हमें मौला हुसैन की गुहार सुनाई देगी भी या नही, हम अपने शहीद इमाम को लब्बैक कह भी सकेंगे या नहीं ? या हम हर बार की तरह कुछ रिवाजों को अंजाम ही देंगे ?

इन सवालों के जवाब हमारे ही भीतर छिपे हुए हैं, सारे जवाब हमारे आमाल ही अंजाम देंगे। रास्ते हमें चुनना है, जैसे इमाम के सहाबियों और दुश्मनाने दीन को चुनना था 1400 साल पहले।

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