लखनऊ में एक मजलिस ऐसी भी जिसकी एक तस्वीर ने बयान कर दी दर्द भरी कहानी

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मुहर्रम शुरू होते ही उर्दू के अख़बारों में और WhatsApp पर मजलिस की फेहरिस्त आम हो जाती है, इस में ग़ौर करने पर चंद मजलिस जो आप उँगलियों पर गिन सकते है वो मर्सिया की होती है।

वालिदा के कहने पर या उससे ज़यादा अच्छी तस्वीर की लालच में मर्सिया की मजलिस सुनने का इरादा किया। 2 मुहर्रम का दिन, छोटा इमामबाडा जैसी जगह और लखनऊ के सबसे मशहूर मर्सिया खान हैदर नवाब जाफरी सहन का बयान, मेरे तसव्वुर में बहुत कुछ आ रहा था।

एक लम्बा पैदल का सफ़र जो दरवाज़े से इमामबाड़े तक, काले हरे पानी के तालाब के किनारे होता है उसको पूरा करके जब पहुंचा तो सब तसव्वुर करा पानी के बुलबुले की तरह ख़त्म हो गया। एकदम हलकी रौशनी, आदमी का कोई नामो निशाँ नहीं और बड़े काले कमरे अपने उलझे मोटे तारों के साथ यहाँ तीन पैर पर नहीं खड़े थे।

ये तो खैर मेरे खुद के लिए अच्छी बात थी। अफ़सोस यहाँ ख़त्म नहीं हुआ उसको तो अभी रफ़्तार पकडनी थी। नवाब साहब ने इधर उधर देखा, जाएजा लिया और खुद ही ज़ाहिर किया के मजलिस शुरू कर रहा हूँ। मौजूद लोगों की तादात उस वक़्त तीन थी।

तस्वीर खीचते वक़्त एक ज़िम्मेदारी सी लग रही थी के मुझे भी अपने कैमरा को रख कर बैठ जाना चाहिए।

खैर मैंने अपना काम किया और नवाब साहब ने कुछ बातों के साथ सलाम और मर्सिया के कुछ बंद पढ़े, अब तक चंद लोग भी आ गए थे। शायद नवाब साहब भी ज़रा हैरान हुए होंगे के इतने सन्नाटे में ये कौन कैमरा लेकर तसवीरें बना रहा है। कुछ पल में उनसे बातें शुरू हुई, उनकी तरफ से दुआओं का शराफ भी हासिल हुआ और बात वही उर्दू पर आ गई। मर्सिया की मजलिस के हाल को उर्दू पर आये ज़वाल को बताया और इसकी वजह के जो घरों में उर्दू को नज़र अंदाज़ किया गया है।

नवाब साहब ने अपनी बातों में सरकार की तरफ से उर्दू में लगाए बोर्ड और ला मार्टिनियर कॉलेज में जोश मलीहाबादी साहब के नाम पर उर्दू शुरू किये जाने का ज़िक्र किया और तारीफ भी.

मेरे खुद के लिए ये बात के छोटा इमामबाड़ा जो हर तरह से सजा और मुकम्मल है अज़ादारी के लिए, वहां मर्सिये की मजलिस वो भी इतने मशहूर मर्सियाख्वां खिताब कर रहे हो और हर तरफ सन्नाटा छाया हुआ हो बहुत फिक्र की बात है।

इसी इमामबाड़े के बहार हुसैनाबाद रोड पर तेज़ जगमगाती रौशनी से लबरेज़ सबीले लगी हुई है जिन में नौहे इतने तेज़ बजते है के सड़क पर गाडी का हॉर्न न सुनाई दे। आस पास लोगों की चहल पहल है, खाने पीने को सबीलों पे सब मौजूद है पर लखनऊ के आलिशान इमामबाड़े में मर्सिया अपने को इतना अकेला पा रहे है के मजलिस में लोगों से ज़ादा नवाबीन के लगाए गए झूमर दीखते है।

इस आर्टिकल को प्रोफेशनल फोटोग्राफ़र औन नकवी ने लिखा है, यह उनकी फेसबुक वाल से लिया गया है।

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