माहे मुहर्रम में हमारे अंदर बदलाव आना क्यों जरूरी है, जानिए इस रिपोर्ट में

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पूरी दुनिया के साथ साथ भारत के बहुत से हिस्सों में हम मुहर्रम के महीने में लोगों की अंजुमनों का हुजूम अक़सर देखते हैं। हर बशर चाहे मर्द हो या औरत या बच्चें अपनी मसरूफ़ ज़िंदगी छोड़ कर ये 10 दिन इमाम हुसैन(अस) की अज़ीम क़ुरबानी को याद करने में लग जाते है।

वहीं एक तरफ यही अज़ादारी एक ख़ुदाई नेअमत है जो मौला के चाहने वालों के दिलों को नर्म करता है, क़सावते क़ल्बी से महफ़ूज़ रखता है। यही अज़ादारी है जो न सिर्फ इंसान में तब्दीली लाती है बल्कि पूरे मुआशरे को तब्दील करती है एक बेहतरीन काल के लिए।

लेकिन ये बदलाव अपने आप ही नही आ जाता। हम ये बदलाव लाने के लिए हमें गौर ओ फिक्र करने की ज़रूरत है। जब तक हम अज़ादारी के मक़सद को नही समझेंगे तो हम इसके हदफ़ तक नही पहुंच सकते।

अगर हमारे आंसू हमारे अंदर बदलाव नहीं ला रहे हैं, हमारे दिल में रहम के बीज नहीं बो रहे हैं, तो ख़ुद से सवाल जायज़ है कि आख़िर यह ग़में हुसैन में बह रहे आंसू किस योग्य हैं ?

मुहर्रम सिर्फ़ एक रस्म या रिवाज नहीं है। बल्कि यह तो एक इंकिलाब है। कर्बला का वाक़्या इंकिलाब है क़ुर्बानियों का, हिम्मत का, किरदार का, विनम्रता का, ज़ुल्म के विरुद्ध खड़े होने का, ख़ुदा का। क्योंकर हमने इस इंकिलाब को दो माह के रिवाज में सीमित करके रख दिया ?

इमाम हुसैन (अ.स.) अपने आज़ादारों मे वह क्या ख़ूबियां देखना चाहेंगे, इस पर विचार कब किया हम लोगों ने?

मौला ने अपनी क़ुर्बानी दीन के ख़ातिर दी है न कि ख़ालिस हमारी काली पोशाकों के लिए। क्यों हमारी नमाज़ छूट रही हैं, मस्जिदे ख़ाली हैं, म्यूज़िक और गानों का शौक पाल रहे हैं, हिजाब से दूर हैं, ख़ुम्स और ज़कात से क्यों भाग रहे हैं ! जबकी मौला हुसैन ने अपना सर तक क़लम करवा दिया, और अहले हरम के पर्दे से इस्लाम का पर्दा बाक़ी है।

अपने आमाल से कहीं हम एक अज़ीम इंक़लाब का मज़ाक तो नही बना रहे हैं? क्या हमको इस गुनाह का तसव्वुर और अहसास भी है?

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