शहादत-ए-इमाम हसन असकरी (अस): जानिए कैसे आपको मिला असकरी का लक़ब

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आठ रबीउल सन 260 हिजरी को 11वें इमाम हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम को इराक़ के सामर्रा शहर में शहीद किया गया था। अपनी 29 साल की ज़िन्दगी में इमाम (अस) दुश्मनों की ओर से बहुत से दुख उठाए और तत्कालीन अब्बासी शासक ‘मोतमिद’ के हुक्म पर इमाम को ज़हर से शहीद किया गया।

हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम को 10वे इमाम-हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की क़ब्र के पास दफनाया गया। इस मौके पर हर साल इस्लामी जगत में अहलेबायत (अस) से मुहब्बत रखने वाले, हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम का ग़म मनाते हैं।

हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम ने बहुत से शागिर्द और आलिमों की ट्रेनिंग किया जो अपने समय के मशहूर और महान आलिम बनकर सामने आए। हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी तीन हिस्सों में देखा जा सकता है। पहला तेरह साल उन्होंने मदीना में गुज़ारा, दूसरे दस साल, इमामत की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद सामर्रा में गुज़ारी और तीसरा छह साल था जो उनकी इमामत का काल था।

उन्हें असकरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि तत्तकालीन अब्बासी शासक ने हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम और उनके वालिद हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को असकरिया नामक एक फौजी इलाके में रहने पर मजबूर किया था ताकि अब्बासी शासक उन पर नज़र रख सके। यही वजह है कि हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम अस्करीयैन के नाम से भी मशहूर हैं।

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