शहादत ए इमाम अली नक़ी (अस): दानशीलता और स्वाभिमान की मिसाल थे इमाम

Share This News

शिया मुसलमानों के दसवें इमाम, इमाम अली नकी (अस) की शहादत इराक के सामर्राह शहर में 3 रजब 254 हिजरी में हुई। उस वक़्त आपकी उम्र महज़ 40 साल थी।

अपने 34 साला दौरे इमामत में इमाम अली नक़ी (अस) ने अपनी इमामत के 7 साल मोतसिम अब्बासी के दौर में गुज़ारे, इस समय में आपकी हर हरकत पर हुकूमत अपने जासूसों के ज़रिये से नज़र रखती थी। यही नहीं लोगों को इमाम (अस) से मिलने से रोका जाता था।

इमाम के साथ साथ बग़दाद और सामर्रा में रहने वाले शियों पर भी हुकूमत की कड़ी निगाह थी, यही वजह है कि यह लोग तक़य्या में जीवन बिता रहे थे, और छिप कर, अपनी पहचान बदल कर एक दूसरे से मिल रहे थे। (REF:अल-इरशाद, पेज 286)

उसके बाद आया मुतवक्किल हुकूमत करने, वह कट्टरता के साथ अहलेबायत का दुश्मन था और दुश्मनी इस हद तक थी कि इमामों की क़ब्रों की ज़ियारत पर पाबंदी लगा रखी थी, और 235 हिजरी में इमाम हुसैन (अस) के रौज़े को ढ़हाने का हुक्म भी दिया। उसके दौर में लाखों शियों को जेल में डाल कर अज़ीयत दी गई और शहीद किया गया।

लेकिन ज़ुल्म ज़यादा नहीं टिकता, आख़िरकार 247 हिजरी में मुतवक्किल अपने ही बेटे मुन्तसिर के हुक्म पर तुर्कों के हाथों मार डाला गया। मुन्तसिर भी छः साल से ज़्यादा हुकूमत नहीं कर सका, उसके बाद मुसतईन जो कि मोतसिम के पोता था उसका उत्तराधिकारी बना।

इमाम अली नक़ी (अस ) होनी दानशीलता और स्वाभिमान में मशहूर थे और अनाथों के पालन पोषण व फक़ीरों की सहायता में प्रसिद्ध थे।
इमाम के ज़माने में जो शासक गुज़रे हैं उनके नाम इस प्रकार हैं
मोतसिम, वासिक़, मुतवक्किल, मुंतसिर, मुसतईन, मोतज़। यह सबके सब दुनिया और पद व धन दौतल के कारण इमाम से ईर्ष्या व बैर रखते थे और अपनी दुश्मनी को ज़ाहिर भी करते थे लेकिन इसके बावजूद इमाम के उच्च गुणों व विशेषताओं को स्वीकार करने पर मजबूर थे। इमाम (अस) के ज्ञान का अनुभव उन्होंने कई बार ज्ञानात्मक वाद -विवाद के माध्यम से किया था।

इमाम अली नक़ी (अ.) की रातें, अल्लाह तआला से राज़ व नियाज़ व इबाबत में जाग कर गुज़रती थीं। हमेशा सादे कपड़े पहना करते थे। हमेशा उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट सजी रहती थी लेकिन इसके बावजूद उनका रोब लोगों के दिलों पर रहता था।

इमाम अली नक़ी (अस) को 254 हिजरी में जहर दे कर शहीद कर दिया गया। मोतज़ अब्बासी ने इमाम अस को सामर्रा में ज़हर दिया और इमाम को उन्हीं के घर में दफनाया गया, जहां आज आपका पवित्र रौज़ा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *